संसार-भर में आनंदित स्तुतिकर्ता होने के लिए अलग किए गए
“याह की स्तुति करो! हे यहोवा के दासो स्तुति करो, यहोवा के नाम की स्तुति करो!”—भजन ११३:१.
१, २. (क) भजन ११३:१-३ के सामंजस्य में, कौन हमारी उत्साहपूर्ण स्तुति के योग्य है? (ख) कौन-सा सवाल पूछना उचित है?
यहोवा परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी का महान सृष्टिकर्ता है, अनंत काल तक हमारा विश्व-सर्वसत्ताधारी। वह हमारी उत्साहपूर्ण स्तुति के पूर्णतः योग्य है। इसीलिए भजन ११३:१-३ हमें आज्ञा देता है: “याह की स्तुति करो! हे यहोवा के दासो स्तुति करो, यहोवा के नाम की स्तुति करो! यहोवा का नाम अब से लेकर सर्वदा तक धन्य कहा जाय! उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक, यहोवा का नाम स्तुति के योग्य है।”
२ परमेश्वर के साक्षियों के तौर पर, हम यह करने में आनंदित होते हैं। यह कितना रोमांचकारी है कि यहोवा परमेश्वर जल्दी ही स्तुति के इस गीत से, जिसे हम आज गा रहे हैं, पूरी पृथ्वी को भर देगा! (भजन २२:२७) क्या इस महान विश्वव्यापी गायन-मंडली में आपकी आवाज़ भी शामिल है? यदि हाँ, तो इस विभाजित, आनंदरहित संसार से अलग होने में आपको कितना ख़ुश होना चाहिए!
३. (क) कौन-सी बात यहोवा के लोगों को विशिष्ट, अनूठा बनाती है? (ख) हम किन तरीक़ों से अलग रखे गए हैं?
३ निश्चय ही एक होकर यहोवा की स्तुति करना हमें विशिष्ट, अनूठा बनाता है। हम सहमति में बोलते और सिखाते हैं और ‘यहोवा की बड़ी भलाई’ की घोषणा करने के लिए एक-समान तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं। (भजन १४५:७) जी हाँ, यहोवा के समर्पित लोगों के तौर पर, हम अपने परमेश्वर, यहोवा की सेवा के लिए अलग रखे गए हैं। परमेश्वर ने अपने प्राचीन समर्पित लोग, इस्राएल को उनके चारों ओर की जातियों से अलग रहने और उनकी प्रथाओं से अछूता रहने के लिए कहा। (निर्गमन ३४:१२-१६) उसने अपने लोगों को ऐसा करने में मदद देने के लिए नियम दिए। इसी तरह आज, यहोवा ने हमें उसका पवित्र वचन, बाइबल दिया है। इसका शिक्षण हमें बताता है कि हम किस तरह इस संसार से अलग रह सकते हैं। (२ कुरिन्थियों ६:१७; २ तीमुथियुस ३:१६, १७) हम मठों या आश्रमों में एकांत में रहने के द्वारा अलग नहीं किए जाते हैं, जैसे कि बड़े बाबुल के साधु और संन्यासिनी रहते हैं। यीशु मसीह के उदाहरण पर चलते हुए, हम यहोवा के सार्वजनिक स्तुतिकर्ता हैं।
यहोवा के मुख्य स्तुतिकर्ता का अनुकरण कीजिए
४. यीशु ने यहोवा की स्तुति करने में एक उदाहरण कैसे रखा?
४ यहोवा की स्तुति करने के अपने उद्देश्य से यीशु कभी विचलित नहीं हुआ। और इस बात ने उसे संसार से अलग किया। आराधनालयों और यरूशलेम के मंदिर में, उसने परमेश्वर के पवित्र नाम की स्तुति की। चाहे पहाड़ की चोटी पर या समुद्र के किनारे, जहाँ भी भीड़ इकट्ठी हो जाती, यीशु ने यहोवा की सच्चाइयों का सार्वजनिक रूप से प्रचार किया। उसने घोषणा की: “हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु; मैं तेरा धन्यवाद करता हूं।” (मत्ती ११:२५) पीलातुस के सामने लाए जाने पर भी, यीशु ने गवाही दी: “मैं ने इसलिये जन्म लिया, और इसलिये जगत में आया हूं कि सत्य पर गवाही दूं।” (यूहन्ना १८:३७) यीशु ने अपने काम का महत्त्व समझा। यीशु जहाँ कहीं भी था, उसने यहोवा की गवाही दी और सार्वजनिक रूप से उसकी स्तुति की।
५. भजन २२:२२ किस पर लागू होता है, और हमारी मनोवृत्ति क्या होनी चाहिए?
५ भजन २२:२२ में, हम यहोवा के मुख्य स्तुतिकर्ता के बारे में यह भविष्य-सूचक कथन पाते हैं: “मैं अपने भाइयों के साम्हने तेरे नाम का प्रचार करूंगा; सभा के बीच मैं तेरी प्रशंसा करूंगा।” और इब्रानियों २:११, १२ में, प्रेरित पौलुस इन आयतों को प्रभु यीशु पर और उन पर लागू करता है जो यहोवा परमेश्वर द्वारा स्वर्गीय महिमा के लिए पवित्र किए गए हैं। उसकी तरह, वे भी कलीसिया के बीच यहोवा के नाम की महिमा करने में शर्मिंदा महसूस नहीं करते। कलीसिया सभाओं में उपस्थित होते समय क्या हमारी ऐसी ही मनोवृत्ति होती है? सभाओं में हमारा मानसिक और मौखिक, दोनों तरह से उत्साहपूर्वक भाग लेना यहोवा की स्तुति करता है। लेकिन क्या हमारी आनंदमय स्तुति यहीं समाप्त हो जाती है?
६. यीशु ने अपने अनुयायियों को क्या आज्ञा दी, और ज्योति के प्रेमी परमेश्वर की महिमा कैसे लाते हैं?
६ मत्ती ५:१४-१६ के अनुसार, प्रभु यीशु ने अपने अनुयायियों को अपनी ज्योति चमकाने की नियुक्ति भी दी ताकि अन्य लोग यहोवा की स्तुति करें। उसने कहा: “तुम जगत की ज्योति हो। . . . तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के साम्हने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बड़ाई करें।” ज्योति के प्रेमी परमेश्वर को महिमा लाते हैं। क्या वे मात्र अच्छी, लोकोपकारी बातें बोलने और करने के द्वारा ऐसा करते हैं? जी नहीं, इसके बजाय वे संयुक्त हो कर यहोवा की महिमा करने के द्वारा ऐसा करते हैं। जी हाँ, ज्योति के प्रेमी अपने आप को परमेश्वर को समर्पित करते हैं और उसके आनंदित स्तुतिकर्ता बनते हैं। क्या आपने यह ख़ुशीभरा क़दम उठाया है?
यहोवा की स्तुति करने से आनंद
७. यहोवा के स्तुतिकर्ता इतने आनंदित क्यों हैं, और सा.यु. ३३ के पिन्तेकुस्त के दिन उन्हें क्या आनंद मिला?
७ यहोवा के स्तुतिकर्ता इतने आनंदित क्यों हैं? क्योंकि आनंद परमेश्वर की पवित्र आत्मा का एक फल है। गलतियों ५:२२ में, इसे प्रेम के ठीक बाद लिखा गया है। पहली शताब्दी में यीशु के शिष्यों ने यहोवा की आत्मा के इस फल को प्रदर्शित किया। सा.यु. ३३ के पिन्तेकुस्त के दिन, जब यहोवा ने यीशु के लगभग १२० शिष्यों पर अपनी पवित्र आत्मा उँडेली, तो वे सभी अलग-अलग भाषाओं में यहोवा की स्तुति करने लगे। कई देशों से जो श्रद्धालु यहूदी यरूशलेम आए थे, वे ‘घबरा गए और चकित हो गए।’ उन्होंने अचरज किया: “हम . . . अपनी अपनी भाषा में उन से परमेश्वर के बड़े बड़े कामों की चर्चा सुनते हैं!” (प्रेरितों २:१-११) यहोवा की इस अद्भुत बहुभाषीय स्तुति का क्या परिणाम हुआ? लगभग ३,००० यहूदी और यहूदी मतधारकों ने मसीहा के बारे में राज्य सुसमाचार को स्वीकार किया। उन्होंने बपतिस्मा लिया, पवित्र आत्मा प्राप्त की, और यहोवा के आनंदित स्तुतिकर्ताओं के रूप में उत्साहपूर्वक अपनी आवाज़ें मिलाईं। (प्रेरितों २:३७-४२) वह क्या ही आशीष थी!
८. पिन्तेकुस्त के बाद, मसीहियों ने अपना आनंद बढ़ाने के लिए क्या किया?
८ रिपोर्ट आगे कहती है: “और वे प्रति दिन एक मन होकर मन्दिर में इकट्ठे होते थे, और घर घर रोटी तोड़ते हुए आनन्द और मन की सीधाई से भोजन किया करते थे। और परमेश्वर की स्तुति करते थे, और सब लोग उन से प्रसन्न थे: और जो उद्धार पाते थे, उनको प्रभु प्रति दिन उन में मिला देता था।” (प्रेरितों २:४६, ४७) क्या यह मात्र उनका इकट्ठा होना और रोटी तोड़ना था जो उन्हें बड़ा आनंद देता था? जी नहीं, उन्हें असली आनंद प्रतिदिन यहोवा की स्तुति करने से मिला। और उनका आनंद और बढ़ गया जब उन्होंने उद्धार के अपने संदेश की ओर हज़ारों की सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी। आज हमारे साथ भी ऐसा ही है।
सभी देशों में आनंदित स्तुतिकर्ता
९. (क) कब और कैसे परमेश्वर ने सब राष्ट्रों के लोगों को उसका सुसमाचार सुनने का मौक़ा देना शुरू किया? (ख) कुरनेलियुस और उसके साथियों के बपतिस्मे से पहले उन पर पवित्र आत्मा क्यों उँडेली गई?
९ यहोवा नहीं चाहता था कि उसके सेवकों की उजियाला-फैलाने की गतिविधि एक ही देश तक सीमित हो। इसलिए, सा.यु. ३६ से उसने सब राष्ट्रों के लोगों को उसका सुसमाचार सुनने का मौक़ा दिया। परमेश्वर के निर्देशन पर, पतरस कैसरिया में एक अन्यजातीय फ़ौजी अफ़सर के घर गया। वहाँ उसने कुरनेलियुस को अपने क़रीबी दोस्तों और परिवार के सदस्यों के साथ इकट्ठा पाया। जब उन्होंने ध्यान से पतरस के शब्दों को सुना, तो उन्होंने अपने मन में यीशु पर विश्वास किया। हम कैसे जान सकते हैं? क्योंकि विश्वास करनेवाले उन अन्यजातीय लोगों पर परमेश्वर की पवित्र आत्मा उतरी। सामान्यतः, परमेश्वर की आत्मा की भेंट बपतिस्मे के बाद ही दी जाती थी, लेकिन उस मौक़े पर यहोवा ने इन ग़ैर-यहूदियों पर उनके निमज्जन से पहले ही अपनी स्वीकृति का संकेत किया। अगर यहोवा ने ऐसा नहीं किया होता, तो पतरस इस बारे में निश्चित नहीं होता कि परमेश्वर अब अन्यजातियों को अपने सेवकों के तौर पर स्वीकार कर रहा था, और कि वे पानी में बपतिस्मे के योग्य थे।—प्रेरितों १०:३४, ३५, ४७, ४८.
१०. प्राचीन काल से यह पहले ही कैसे बता दिया गया था कि सब राष्ट्रों के लोग यहोवा की स्तुति करेंगे?
१० प्राचीन काल से, यहोवा ने पहले ही बता दिया था कि सब राष्ट्रों के लोग उसकी स्तुति करेंगे। उसके आनंदित स्तुतिकर्ता प्रत्येक देश में होंगे। यह सिद्ध करने के लिए प्रेरित पौलुस ने इब्रानी शास्त्र की भविष्यवाणियों का हवाला दिया। उसने रोम में मसीहियों की अंतर्राष्ट्रीय कलीसिया से कहा: “जैसा मसीह ने भी परमेश्वर की महिमा के लिये तुम्हें ग्रहण किया है, वैसे ही तुम भी एक दूसरे को ग्रहण करो। मैं कहता हूं, कि जो प्रतिज्ञाएं बापदादों को दी गई थीं, उन्हें दृढ़ करने के लिये मसीह, परमेश्वर की सच्चाई का प्रमाण देने के लिये खतना किए हुए लोगों का सेवक बना। और अन्यजाति भी दया के कारण परमेश्वर की बड़ाई करें; जैसा [भजन १८:४९ में] लिखा है; कि इसलिये मैं जाति जाति में तेरा धन्यवाद करूंगा, और तेरे नाम के भजन गाऊंगा। फिर [व्यवस्थाविवरण ३२:४३ में] कहा है, हे जाति जाति के सब लोगो, उस की प्रजा के साथ आनन्द करो। और फिर [भजन ११७:१ में] हे जाति जाति के सब लोगो, प्रभु की स्तुति करो; और हे राज्य राज्य के सब लोगो; उसे सराहो।” (तिरछे टाइप हमारे)—रोमियों १५:७-११.
११. परमेश्वर ने सब राष्ट्रों के लोगों को उसकी सच्चाइयाँ सीखने में कैसे मदद दी है, और उसका क्या नतीजा रहा है?
११ लोग तब तक एक होकर यहोवा की स्तुति नहीं कर सकते जब तक कि वे अपनी आशा यीशु मसीह पर नहीं रखते, जिसे परमेश्वर ने सब राष्ट्रों के लोगों पर शासन करने के लिए नियुक्त किया है। उन्हें अनंत जीवन तक ले जानेवाली अपनी सच्चाइयों के लिए क़दर दिखाने में मदद करने के लिए, परमेश्वर ने एक अंतर्राष्ट्रीय शिक्षण कार्यक्रम स्थापित किया है। वह अपने विश्वासयोग्य दास वर्ग के ज़रिए निर्देशन दे रहा है। (मत्ती २४:४५-४७) नतीजा? ५० लाख से भी ज़्यादा आनंदित आवाज़ें २३० से भी ज़्यादा देशों में यहोवा के स्तुतिगीत गा रही हैं। और लाखों अन्य लोग ठीक वैसा ही करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। देखिए १९९६ में कितने लोग स्मारक में उपस्थित हुए: १,२९,२१,९३३. अद्भुत!
आनंदित स्तुतिकर्ताओं की एक बड़ी भीड़ पूर्वबतायी गई
१२. प्रेरित यूहन्ना ने कौन-से उत्तेजक दर्शन का अनुभव किया, और उसकी जीवित वास्तविकता क्या है?
१२ दर्शन में, प्रेरित यूहन्ना ने हर एक जाति से ‘एक बड़ी भीड़’ को देखा। (प्रकाशितवाक्य ७:९) परमेश्वर के अभिषिक्त शेषवर्ग के साथ यह बड़ी भीड़ जो स्तुतिगीत गा रही है उसका विषय क्या है? यूहन्ना हमें बताता है: “सिंहासन पर विराजमान हमारे परमेश्वर और मेमने से ही उद्धार है!” (प्रकाशितवाक्य ७:१०, NHT) संसार के हर कोने में इसकी बेधड़क घोषणा की जा रही है। मानो खजूर की डालियाँ हिलाते हुए, हम संयुक्त रूप से विश्व सर्वसत्ताधारी के तौर पर परमेश्वर की जय-जयकार करते हैं और स्वर्ग और पृथ्वी के सामने आनंदपूर्वक स्वीकार करते हैं कि हमारा उद्धार उसके और उसके पुत्र, मेम्ने, यीशु मसीह “से ही” है। अहा, प्रेरित यूहन्ना ने बड़ी भीड़ के इस उत्तेजक दर्शन को देखने में क्या ही रोमांच का अनुभव किया! और जो यूहन्ना ने देखा उसकी जीवित वास्तविकता को देखने, और साथ ही उसका हिस्सा होने का क्या ही रोमांच आज हमें प्राप्त है!
१३. कौन-सी बात यहोवा के लोगों को संसार से अलग करती है?
१३ यहोवा के सेवकों के तौर पर, हम गर्व से उसका नाम धारण करते हैं। (यशायाह ४३:१०, १२) हमारा यहोवा के साक्षी होना हमें इस संसार से अलग करता है। परमेश्वर के विशिष्ट नाम को धारण करना और उसके ईश्वरीय कार्य को करने का हमारे जीवन में उद्देश्य होना क्या ही आनंद की बात है! उस राज्य के द्वारा अपने पावन नाम का पवित्रीकरण करने और अपनी विश्व सर्वसत्ता का दोषनिवारण करने के यहोवा के जो महान उद्देश्य ने हमारे जीवन को अर्थ दिया है। और उसने हमें उसके नाम और राज्य के संबंध में उसके ईश्वरीय उद्देश्य में एक जगह पाने में मदद दी है। यह उसने तीन तरीक़ों से किया है।
सच्चाई सौंपी गई
१४, १५. (क) वह एक तरीक़ा कौन-सा है जिससे परमेश्वर ने, हमें उसके नाम और राज्य के संबंध में उसके ईश्वरीय उद्देश्य में एक जगह पाने में मदद दी है? (ख) सा.यु. १९१४ में स्थापित राज्य, उस राज्य से किस प्रकार अलग है जिसका सा.यु.पू. ६०७ में तख़्ता पलट दिया गया था?
१४ पहला, यहोवा ने अपने लोगों को सच्चाई सौंपी है। सबसे उत्तेजक प्रकटीकरण यह है कि उसके राज्य ने १९१४ में शासन करना आरंभ किया। (प्रकाशितवाक्य १२:१०) यह स्वर्गीय सरकार यरूशलेम के उस प्रतिरूपी राज्य से भिन्न है, जहाँ दाऊद की वंशावली के राजा गद्दी पर बैठा करते थे। उस राज्य का तख़्ता पलट दिया गया, और सा.यु.पू. ६०७ से यरूशलेम अन्यजातीय विश्व-शक्तियों के शासन के पूरी तरह से अधीन कर दिया गया। जो नया राज्य यहोवा ने १९१४ में स्थापित किया, वह एक ऐसी स्वर्गीय शक्ति है जो यहोवा के अलावा किसी और के अधीन नहीं होगी, ना ही अनंतकाल तक टूटेगी। (दानिय्येल २:४४) साथ ही, इसका शासकत्त्व भी भिन्न है। कैसे? प्रकाशितवाक्य ११:१५, १६ जवाब देता है: “स्वर्ग में इस विषय के बड़े बड़े शब्द होने लगे कि जगत का राज्य हमारे प्रभु का, और उसके मसीह का हो गया। और वह युगानुयुग राज्य करेगा।”—तिरछे टाइप हमारे।
१५ ‘हमारे प्रभु का, और उसके मसीह का राज्य’ मानवजाति के पूरे संसार पर अधिकार रखता है। यहोवा की सर्वसत्ता की यह नई अभिव्यक्ति, जिसमें उसका मसीहाई पुत्र और यीशु के १,४४,००० भाई शामिल हैं, जिनमें से अधिकांश जन अब स्वर्गीय महिमा को पुनरुत्थित हो चुके हैं, मात्र अकादमिक दिलचस्पी की बात नहीं है—मानो कोई सैद्धांतिक विषय जिसके बारे में विद्यार्थी शायद चर्चा करना चाहें। जी नहीं, यह स्वर्गीय राज्य एक वास्तविक सरकार है। और उसके शासन के परिणामस्वरूप, परिपूर्णता में सदा के लिए जीने की हमारी सुखद प्रत्याशा हमें आनंद मनाते रहने का पर्याप्त कारण देती है। यहोवा के वचन की ऐसी सच्चाइयों का सौंपा जाना हमें उसके बारे में हमेशा अच्छा बोलने के लिए प्रेरित करता है। (भजन ५६:१०) क्या आप नियमित तौर पर ऐसा कर रहे हैं, सभी को यह बताने के द्वारा कि परमेश्वर का मसीहाई राज्य अभी स्वर्ग में शासन कर रहा है?
पवित्र आत्मा और एक विश्वव्यापी भाईचारे द्वारा मदद प्राप्त
१६, १७. वह दूसरा और तीसरा तरीक़ा कौन-सा है जिसके द्वारा परमेश्वर ने हमें उसके ईश्वरीय उद्देश्य में जगह पाने में मदद दी है?
१६ दूसरा तरीक़ा जिसके द्वारा परमेश्वर ने हमें उसके ईश्वरीय उद्देश्य में जगह पाने में मदद दी है, वह है: उसने हमें अपनी पवित्र आत्मा दी है जो हमें अपने जीवन में आत्मा के सुंदर फल उत्पन्न करने में और परमेश्वर की स्वीकृति पाने में समर्थ करती है। (गलतियों ५:२२, २३) इसके अलावा, पौलुस ने अभिषिक्त मसीहियों को लिखा: “हम ने . . . वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।” (१ कुरिन्थियों २:१२) यहोवा की आत्मा की ओर प्रतिक्रिया दिखाने के द्वारा, हम सब अभी उन वर्तमान अच्छी चीज़ों को जान और समझ सकते हैं जो उसने हमें कृपा करके दी हैं—उसके वायदे, नियम, सिद्धांत, इत्यादि।—मत्ती १३:११ से तुलना कीजिए।
१७ और तीसरा तरीक़ा जिसके द्वारा परमेश्वर हमारी मदद कर रहा है, वह है हमारा विश्वव्यापी भाईचारा और उपासना के लिए यहोवा का आनंददायी संगठनात्मक प्रबंध। प्रेरित पतरस इसके बारे में बोला जब उसने हमसे आग्रह किया कि “भाइयों के पूरे संघ के लिए प्रेम रखो।” (१ पतरस २:१७, NW) भाइयों और बहनों का हमारा प्रेममय अंतर्राष्ट्रीय परिवार हमें मन के बड़े आनंद के साथ यहोवा की सेवा करने में मदद करता है, जैसे भजन १००:२ आज्ञा देता है: “आनन्द से यहोवा की आराधना करो! जयजयकार के साथ उसके सम्मुख आओ!” आयत ४ आगे कहती है: “उसके फाटकों से धन्यवाद, और उसके आंगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश करो, उसका धन्यवाद करो, और उसके नाम को धन्य कहो!” सो चाहे हम सार्वजनिक रूप से प्रचार कर रहे हों या हमारी सभाओं में हों, हम आनंद का अनुभव कर सकते हैं। यहोवा के आत्मिक मंदिर के सुंदर आँगन में हमने क्या ही शांति और सुरक्षा पाई है!
आनंदपूर्वक यहोवा की स्तुति करो!
१८. सताहट, या दूसरी समस्याओं द्वारा परेशान किए जाने के बावजूद भी हम यहोवा की स्तुति करने में आनंद क्यों मना सकते हैं?
१८ चाहे कैसी भी कठिन परिस्थितियाँ, सताहट, या दूसरी समस्याएँ हमें परेशान करें, आइए हम आनंद मनाएँ कि हम यहोवा की उपासना के घर में हैं। (यशायाह २:२, ३) याद रखिए कि आनंद हृदय का गुण है। हमारे प्रारंभिक मसीही भाई और बहन कई मुश्किलों का सामना करने और नुक़सान उठाने के बावजूद यहोवा के आनंदित स्तुतिकर्ता थे। (इब्रानियों १०:३४) आज हमारे संगी विश्वासी ठीक उनके जैसे हैं।—मत्ती ५:१०-१२.
१९. (क) कौन-से दोहराए गए आदेश हमें यहोवा की स्तुति करने के लिए प्रेरित करते हैं? (ख) हमारे अनंत जीवन किस बात पर निर्भर करते हैं, और हमारा दृढ़ संकल्प क्या है?
१९ हम सब जो यहोवा की सेवा करते हैं, उसकी स्तुति करने के लिए बाइबल के आदेशों का पालन करने में ख़ुश होते हैं। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में परमेश्वर की स्तुति के बीच-बीच में “हल्लिलूय्याह” की अभिव्यक्ति का प्रयोग किया गया है। (प्रकाशितवाक्य १९:१-६) भजन १५० की छः आयतों में, हमें यहोवा की स्तुति करने के लिए १३ बार कहा गया है। यह यहोवा का स्तुतिगीत आनंदपूर्वक गाने में शामिल होने के लिए सारी सृष्टि से एक विश्वव्यापी अपील है। हमारा अनंत जीवन इस महान हल्लिलूय्याह कोरस में शामिल होने पर निर्भर करता है! जी हाँ, सर्वदा जीवित रहनेवाले व्यक्ति सिर्फ़ वे होंगे जो यहोवा की लगातार स्तुति करते हैं। इसलिए, जैसे-जैसे अंत क़रीब आता है हम उसकी वफ़ादार विश्वव्यापी कलीसिया से जुड़े रहने के लिए दृढ़ संकल्पी हैं। तब, हम भजन १५० के आख़िरी शब्दों की पूर्ति देखने की आशा कर सकते हैं: “जितने प्राणी हैं सब के सब याह की स्तुति करें! याह की स्तुति करो!”
आप कैसे जवाब देंगे?
◻ कौन-सी बात यहोवा के लोगों को विशिष्ट, अनूठा बनाती है?
◻ यहोवा के सेवक इतने आनंदित क्यों हैं?
◻ कौन-सी बात हमें संसार से अलग करती है?
◻ कौन-से तीन तरीक़ों से परमेश्वर ने हमें उसके ईश्वरीय उद्देश्य में एक जगह पाने में मदद दी है?
[पेज 17 पर तसवीर]
यीशु जहाँ कहीं भी था, उसने यहोवा की गवाही दी और सार्वजनिक रूप से उसकी स्तुति की